अहम् ब्रह्मास्मि!

 

मैं कामदेव, मैं दैत्यराज,

मैं यक्षराज, मैं परम् पिशाच।

 

मैं कैलाशनाथ, मैं गृहत्यागी,

मैं प्रेतराज, मैं आदियोगी।

 

मैं सृजनकारी, मैं प्रलयकर्ता,

मैं तीव्र वेग, मैं स्थिरता।

 

मैं ठूँठ वृक्ष, मैं हूँ पलाश,

मैं जीवनदाता, मैं सर्वनाश।

 

मैं वायु मंद, मैं अंधड़ भारी,

मैं प्रकांड पंडित, मैं भुजंगधारी।

 

मैं ज्वालपति, मैं जलाधिश,

मैं पिऊँ पियूष, मैं पिऊँ विष।

 

मैं हूँ जड़, मैं ही चेतन,

मैं मिट्टी हूँ, मैं ही केतन।

 

मैं हूँ बाहर, मैं ही भीतर,

मैं हूँ नश्वर, मैं अजर अमर।

 

मैं हूँआरंभ, मैं ही अंत,

मैं हूँ परिमित, मैं ही अनंत।

 

मैं घोर अंधेरा, मैं हूँ रश्मि,

मैं ‘तुम’ हूँ, अहम् ब्रह्मास्मि।

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