अंतर्द्वंद्व

 

झ्स पार पहचानी शामें हैं,

उस पार अनदेखी वादी।

 

इस पार पुराने कृत्य रहेंगे,

उस पार नये की आजादी।

 

इस पार हैं तृप्त से चेहरे,

उस पार भुखों की आबादी।

 

इस पार साथ में द्रोण खड़े है,

उस पार एकलव्य सी बर्बादी।

 

मैं चुना चुनूँ या दिल की सुनूँ ?

जोख़िम लूँ नया, या होने दूँ?

 

सफलों की सुनूँ या साहस की?

क्या है गलत, क्या हैं सही?

5 thoughts on “अंतर्द्वंद्व”

  1. बहुत सुंदर जिंदगी के काफी करीब है।

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