प्रार्थना !

 

जिस पथ चलने वाला हूँ,

वो काँटो से भर दो मेरी।

थोड़े और वज्र गिराओ मुझ पर,

थोड़ी और परीक्षा लो मेरी।

 

अर्जित दीपक की चाह मुझे,

निःशुल्क मिली प्रभात नहीं।

मुझे भी अपनी सीमा का,

अंत अभी तक ज्ञात नहीं।

 

जो विघ्न मेघ हैं घिरे हुए,

वो निश्चित हीं द्दँट जायेंगे।

सहनशीलता, धैर्य, पराक्रम,

बरसा कर के जायेंगे।

 

मुझे निवेदन-याचन भयभीत करें,

शस्त्रों के आघात नहीं।

मुझे भी अपनी सीमा का,

अंत अभी तक ज्ञात नहीं।

 

प्रभु! कुछ और अपेक्षा नहीं मेरी,

बस हिम्मत मुझको दे देना,

धन-संपति, सुख-सुविधा, साधन,

भले इनसे वंचित कर देना।

 

लड़ के लूँगा, जो है मेरा,

स्वीकृत मुझे खैरात नहीं।

मुझे भी अपनी सीमा का,

अंत अभी तक ज्ञात नहीं।

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