यात्रा !

 

अब तक का जीवन दुष्कर मेरा,

रहा विपदाओं का बीहड़ घेरा।

 

जब भी मैं चला, खा ठोकर गिरा।

हर बार उठा, मैं सिरफिरा।

मदद ली, पर न भीख लिया,

अकेले चलना सीख लिया।

 

किसी के अभिपुष्टि की चाह नहीं,

'कोई क्या कहेगा ?' परवाह नहीं।

 

मिलें अवसरवादी, की बातें प्यारी,

दे दी उनको कीर्ति सारी।

हिस्से में अपने कालिख लिया,

अकेले चलना सीख लिया।

 

कोशिश थी सबको ले के चलूँ,

निष्कपट रहूँ , मैं फूलूँ- फलूँ।

 

विश्वासघात मिला अपनों से,

 वज्रघात हुआ सपनों पे।

थोड़ा रोया, थोड़ा चीख लिया,

अकेले चलना सीख लिया।

2 thoughts on “यात्रा !”

  1. बहुत बहुत बधाई अभिनव जी, आपकी काव्य पंक्तियां पढ़ कर सुखद अनुभूति हो रही है। इन पंक्तियों को पढ़ कर हरबंश राय बच्चन जी की “कोशिस करने वालो की हार नहीं होती” याद आ गई।

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